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बुद्धत्व की प्राप्ति : Attainment of Inner Peace

एक सम्राट था जो मुर्गो की लड़ाई की वार्षिक प्रतियोगिता में अपने मुर्गे को भी भेजना चाहता था। तो उसने एक बहुत बड़े झेन फ़क़ीर को बुलाया।  उस फ़क़ीर की बड़ी प्रसिद्धि थी उसे युद्ध में कोई हरा नहीं सकता।  हराना  तो दूर , उसके पास आकर लोग हारने के लिए उत्सुक हो जाते थे और उस से हार कर प्रसन्न हो कर लौटते थे।  उस फ़क़ीर से हार जाने की बात बहुत गौरव की बात समझी जाती थी।  तो सम्राट ने सोचा की यह फ़क़ीर यदि मेरे मुर्गे को प्रतियोगिता के लिए त्यार कर दें।

फ़क़ीर को बुलाया गया। फ़क़ीर मुर्गे को साथ ले गया। तीन हफ्ते बाद सम्राट ने पुछवाया , मुर्गा तैयार है? फ़क़ीर ने कहा अभी नहीं।  अभी तो दूसरे मुर्गे को देख कर वह सर खड़ा कर के आवाज देता है। सम्राट को थोड़ी हैरानी हुई कि यह तो सही लक्षण है क्यूंकि यदि लड़ना है तो सर खड़ा करके आवाज न देगा तो दूसरे मुर्गे को डरायेगा कैसे ?

खैर, कुछ और दिन प्रतीक्षा की गयी।  सम्राट ने फिर पुछवाया।  फ़क़ीर ने फिर न में जवाब दिया। फ़क़ीर बोलै की उसकी पुरानी आदत तो जा चुकी , लेकिन अभी भी अगर दूसरा मुर्गा आता है तो तन क खड़ा हो जाता है , अकड़ में आ जाता है। फिर और तीन हफ्ते बीत गए। सम्राट ने फिर पुछवाया। फ़क़ीर ने कहा अब थोड़ा थोड़ा तैयार है, लेकिन अभी थोड़ा वक़्त और लगेगा।  अभी भी दूसरा मुर्गा कमरे में आ जाये तो खड़ा तो रहता है , लेकिन अंदर ही अंदर व्यथित हो जाता है , तनावग्रस्त हो जाता है।

फिर एक दिन फ़क़ीर ने कहलवाया कि अब मुर्गा पूरी तरह से तैयार है।  अब वह ऐसे खड़ा रहता की जैसे कोई आया ही न हो , या कोई गया ही न हो।  और अब कोई फ़िक्र या तनाव नहीं।  सम्राट चिंता में पड़ गया कि अब यह जीतेगा कैसे??

फ़क़ीर ने कहा तुम चिंता मत करो , अब हारने की कोई सम्भावना ही नहीं रही। दूसरे मुर्गे इसे देखते ही भाग खड़े होंगे।  इसे लड़ने की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी।  इसकी उपस्तिथि ही काफी है।

प्रतियोगिता के दिन हुआ भी ऐसा ही। मुर्गे को प्रतियोगिता के लिए खड़ा किया गया तो दूसरे मुर्गो ने उसे सिर्फ झांक कर देखा , लेकिन उस मुर्गे ने जवाब में कोई आवाज नहीं दी , क्यूंकि यदि वो जवाब में आवाज देता तो ये उसके भय और कमजोरी के लक्षणों को प्रदर्शित करता।  भय को छिपाने के लिए ही कोई मुर्गा जोर से कुकड़-कू बोलता है वह डराना चाहता है, लेकिन अंदर से स्वयं डरा हुआ होता है।

तो उस मुर्गे ने न आवाज दी, और न ही किसी और मुर्गे को देखा।  जैसे कुत्ते भौंकते रह जाते हैं और हठी गुजर जाता है , ऐसे ही वह मुर्गा भी खड़ा रहा , जैसे कोई पत्थर की मूर्ति हो।  दूसरे मुर्गो ने देखा तो उनकी कंपकपी छूट गयी क्यूंकि यह तो बहुत अजीब था दूसरे मुर्गो जैसा नहीं है  , जरूर कोई बात है तो इसके पास जाना खतरे से खाली नहीं , तो अन्य मुर्गे सब भाग खड़े हुए प्रतियोगिता में उतर नहीं सके। इस प्रकार सम्राट के शांत मुर्गे की जीत हुई।

शिक्षा : सम्राट के शांत मुर्गे की भाँती ही हमे भी इतना ही शांत होना चाहिए की यदि कोई हम पर क्रोध करता हो या हमसे लड़ना भी चाहे तो हम पर उसके क्रोध का कोई प्रभाव न दिखे हम उसके उत्तर में क्रोध न दिखाएं।  इसी प्रकार एक अच्छे मनुष्य को व्यर्थ का क्रोध नहीं करना चाहिए , और न ही तनावग्रस्त होना चाहिए , अपने अंदर इतनी शांति उत्पन्न कर लें जैसे बुद्धत्व को पा  लिया हो।

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Category:hindi, Moral Stories
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